(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.218. अध्यायः 218
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति शिष्याय गुरूक्तवार्ष्णेयाध्यात्मानुवादः॥ 1॥
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text


गुरुरुवाच। 12-218-0x(6094)(73829)
निष्कल्मषं ब्रह्मचर्यमिच्छताचरितुं सदा।
निद्रा सर्वात्मना त्याज्या स्वप्नदोषमवेक्षता॥ 12-218-1(73830)
स्वप्ने हि रजसा देही तमसा चाभिभूयते।
देहान्तरमिवापन्नश्चरत्यपगतस्मृतिः॥ 12-218-2(73831)
ज्ञानाभ्यासाज्जागरिता जिज्ञासार्थमनन्तरम्।
विज्ञानाभिनिवेशात्तु स जागर्त्यनिशं सदा॥ 12-218-3(73832)
अत्राह कोन्वयं भावः स्वप्ने विषयवानिव।
प्रलीनैरिन्द्रियैर्देही वर्तते देहवानिव॥ 12-218-4(73833)
अत्रोच्यते यथा ह्येतद्वेद योगेश्वरो हरिः।
तथैतदुपपन्नार्थं वर्णयन्ति महर्षयः॥ 12-218-5(73834)
इन्द्रियाणां श्रमात्स्वप्नमाहुः सर्वगतं मनः।
`तन्मयानीन्द्रियाण्याहुस्तावद्गच्छन्ति तानि वै॥ 12-218-6(73835)
अत्राहुस्त्रितयं नित्यमतथ्यमिति चेच्च न।
प्रथमे वर्तमानोऽसौ त्रितयं चेति सर्वदा॥ 12-218-7(73836)
नेतरावुपसंगम्य विजानाति कथंचन।
स्वप्नावस्थागतो ह्येष स्वप्न इत्येव वेत्ति च॥ 12-218-8(73837)
तदप्यसदृशं युक्त्या त्रितयं मोहलक्षणम्।
यदात्मत्रितयान्मुक्तस्तदा जानात्यसत्कृतः॥' 12-218-9(73838)
मनसस्त्वप्रलीनत्वात्तत्तदाहुर्निदर्शनम्।
कार्ये चासक्तमनसः संकल्पो जाग्रतो ह्यपि।
यद्वन्मनोरथैश्चर्यं स्वप्ने तद्वन्मनोगतम्॥ 12-218-10(73839)
संसाराणामसंख्यानां कामात्मा तदवाप्नुयात्।
मनस्यन्तर्हितं सर्वं वेद सोत्तमपूरुषः॥ 12-218-11(73840)
गुणानामपि यद्येतत्कर्मणा चाप्युपस्थितम्।
तत्तच्छंसन्ति भूतानि मनो यद्भावितं यथा॥ 12-218-12(73841)
ततस्तमुपसर्पन्ति गुणा राजसतामसाः।
सात्विका वा यथायोगमानन्तर्यफलोदयम्॥ 12-218-13(73842)
ततः पश्यन्त्यसंबन्धान्वातपित्तकफोत्तरान्।
रजस्तमोभवैर्भावैस्तदप्याहुर्दुरत्ययम्॥ 12-218-14(73843)
प्रसन्नैरिन्द्रियैर्यद्यत्संकल्पयति मानसम्।
तत्तत्स्वप्नेप्युपरते मनो बुद्धिर्निरीक्षते॥ 12-218-15(73844)
व्यापकं सर्वभूतेषु वर्तते दीपवन्मनः।
आत्मप्रभावात्तं विद्यात्सर्वा ह्यात्मनि देवताः॥ 12-218-16(73845)
मनस्यन्तर्हितं द्वारं देहमास्थाय मानुषम्।
यत्तत्सदसदव्यक्तं स्वपित्यस्मिन्निदर्शनम्॥ 12-218-17(73846)
`व्यक्तभेदमतीतोऽसौ चिन्मात्रं परिदृश्यते।'
सर्वभूतात्मभूतस्थं तमध्यात्मगुणं विदुः॥ 12-218-18(73847)
लिप्सेन मनसा यश्च संकल्पादैश्वरं गुणम्।
आत्मप्रसादात्तं विद्यात्सर्वा ह्यात्मनि देवताः॥ 12-218-19(73848)
एवं हि तपसा युञ्ज्यादर्कवत्तमसः परम्।
त्रैलोक्यप्रकृतिर्देही तमसोन्ते महेश्वरम्॥ 12-218-20(73849)
तपो ह्यधिष्ठितं देवैस्तपोघ्नमसुरैस्तमः।
एतद्देवासुरैर्गुप्तं तदाहुर्ज्ञानलक्षणम्॥ 12-218-21(73850)
सत्त्वं रजस्तमश्चेति देवासुरगुणान्विदुः।
सत्त्वं देवगुणं विद्यादितरावासुरौ गुणौ॥ 12-218-22(73851)
`सत्त्वं मनस्तथा बुद्धिर्देवा इत्यभिशंब्दिताः।
तैरेव हि वृतस्तस्माज्ज्ञात्वैवं परमं-----॥ 12-218-23(73852)
निद्राविकल्पेन सतां---- विशति लोकवत्।
स्वस्थो भवति गूढात्मा कलुषैः परिवर्जितः॥ 12-218-24(73853)
निशादिका ये कथिता लोकानां कलुषा मताः।
तैर्हीनं यत्पुरं शुद्धं बाह्याभ्यन्तरवर्तिनम्।
सदानन्दमयं नित्यं भूत्वा तत्परमन्वियात्॥ 12-218-25(73854)
एवमाख्यातमत्यर्थं ब्रह्मचर्यमकल्मषम्।
सर्वसंयोगहीनं तद्विष्ण्वाख्यं परमं पदम्।
अचिन्त्यमद्भुतं लोके ज्ञानेन परिवर्तते॥' 12-218-26(73855)
ब्रह्म तत्परमं ज्ञानममृतं ज्योतिरक्षरम्।
ये विदुर्भावितात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम्॥ 12-218-27(73856)
हेतुमच्छक्यमाख्यातुमेतावज्ज्ञानचक्षुषा।
प्रत्याहारेण वा शक्यमव्यक्तं ब्रह्म वेदितुम्॥ ॥ 12-218-28(73857)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 218॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-218-2 अपगतस्पृहः इति झ. पाठः॥ 12-218-11 वेद सोऽन्तरपूरुषः इति ट. पाठः॥ 12-218-16 अप्रतिमं मनः इति ध. पाठः। अप्रतिधं मनः इति झ. पाठः॥ 12-218-21 गुप्तं ज्ञानाज्ञानस्य लक्षणमिति थ. ध. पाठः॥ 12-218-27 ब्रह्म तत्परमं वेद्यं इति ट. थ. पाठः। ये विदुः सात्विकात्मानः इति थ. पाठः॥


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